मीडिया ने ऐसे गढ़ी रेल किराये बढ़ने की फर्जी ख़बर

मीडिया का एक तबका नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ फर्जी खबर उड़ाते फिर रंगे हाथ पकड़ा गया है। दरअसल 2-3 दिन से सोशल मीडिया और Whatsapp पर एक खबर शेयर की जा रही थी कि जल्द ही रेल किराये बढ़ने वाले हैं क्योंकि रेलवे के टिकटों पर अब यह बताया जाने लगा है कि किराये में कितना हिस्सा सब्सिडी का है। Whatsapp पर उड़ रही अफवाहों को अखबारों और चैनलों की वेबसाइट्स ने फौरन हाथोंहाथ लिया और बिना रेलवे से खबर की पुष्टि किए यह अफवाह उड़ा दी गई कि 1 जुलाई से किरायों में भारी बढ़ोतरी होने वाली है। खबर के पीछे छिपी बदनीयती तो इसी बात से समझा जा सकता है कि रेलवे के औपचारिक खंडन के बावजूद अखबारों ने अपनी खबरों में उसका जिक्र तक नहीं किया है।

किराये पर सब्सिडी छोड़ने की अपील का झूठ

कई अखबारों और चैनलों ने खबर दी कि केंद्र सरकार लोगों से रेल किराये पर मिलने वाली 43 फीसदी सब्सिडी छोड़ने की अपील कर सकती है। यह सिर्फ अटकलबाजी थी। मीडिया ने सरकार से इस बारे में पुष्टि किए बिना खबर चला दी एनडीटीवी ने तो सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के सूत्रों के हवाले से बता दिया कि जल्द ही प्रधानमंत्री रेल किरायों पर सब्सिडी छोड़ने की अपील करने वाले हैं। कुछ अंग्रेजी अखबारों ने 21 जून को यह खबर छापी थी। अगले दिन यानी 22 जून को हिंदी मीडिया ने इस खबर को जस का तस उठा लिया।

टिकट पर छपे मैसेज को लेकर विवाद

अगर रेलवे के टिकट पर यह बताया जाता है कि किराये का कितना हिस्सा किस मद में है तो यह कहीं न कहीं पारदर्शिता की कोशिश ही माना जाना चाहिए। क्योंकि जवाबदेही भी इसी से तय होती है। आगे चलकर इस बात पर जरूर बहस हो सकती है कि आखिर अमीरों और धन्नासेठों को 43% सब्सिडी लेने का क्या अधिकार है। लेकिन पेड मीडिया ने इस मैसेज को यात्रियों के स्वाभिमान के साथ जोड़ दिया। एक न्यूज़ वेबसाइट ने तो यहां तक लिख डाला कि सरकार लोगों पर एहसान जता रही है। नीचे लिंक पर क्लिक करके आप इस फर्जी खबर की सच्चाई जान सकते हैं।

भारतीय रेलवे से क्यों नाराज़ है मीडिया?

दरअसल भारतीय मीडिया का बड़ा तबका रेल मंत्री सुरेश प्रभु से बेहद नाराज है। इसके पीछे बड़ी वजह है पत्रकारों की मुफ्तखोरी बंद हो जाना। कांग्रेस सरकार के रेल मंत्रियों के दौर में दिल्ली में रेलवे भवन के गेट पर एक डिब्बा लगा होता था, जिसमें पत्रकार अपने वेटिंग लिस्ट टिकट की डिटेल डाल दिया करते थे और उन्हें हेडक्वार्टर कोटे से कन्फर्म टिकट दे दिया जाता था। कई पत्रकारों ने इसे कमाई का जरिया भी बना लिया था। वो दूसरों से पैसे लेकर उनके टिकट कन्फर्म कराने लगे थे। लालू यादव ने तो रेल मंत्री रहते हुए सिर्फ पत्रकारों की नाजायज़ जरूरतें पूरी करने के लिए एक अधिकारी को रेल भवन में नियुक्त कर रखा था। इन कारणों से मीडिया कभी उनके खिलाफ नेगेटिव खबरें नहीं दिखाता था। चूंकि सुरेश प्रभु के रेल मंत्री बनने के कुछ दिन बाद ही यह मुफ्तखोरी बंद करवा दी गई, इसलिए मीडिया झूठी खबरें उड़ाकर सरकार को बदनाम करने का कोई मौका नहीं छोड़ती।

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