किसी भी सुधार के लिए तैयार नहीं हैं अदालतें?

सुप्रीम कोर्ट की कोलेजियम ने न्यायपालिका में सुधार के केंद्र सरकार के सारे सुझावों को नामंजूर कर दिया है। केंद्र ने सुझाव दिया था कि जजों की नियुक्ति में मेरिट यानी योग्यता को थोड़ा और अहमियत दी जानी चाहिए। लेकिन कोलेजियम का मानना है कि जजों की वरिष्ठता उनकी काबिलियत से ज्यादा महत्वपूर्ण है। कोलेजियम, जजों की वो संस्था होती है जो ऊपरी अदालत के जजों की नियुक्ति करती है। जाहिर है इस रवैये से सरकार और न्यायपालिका के बीच एक बार फिर से टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है। इस बारे में एक रिपोर्ट आज टाइम्स ऑफ इंडिया ने छापी है।


केंद्र के सुझावों का क्या था मकसद?

सरकार चाहती थी कि जजों की नियुक्ति में उनका मेरिट भी ध्यान में रखा जाए। ताकि किसी सीनियर जज को हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस न होने पर भी सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया जा सके। इतना ही नहीं योग्यता के आधार पर कोई जज अपने किसी सीनियर के मुकाबले प्राथमिकता पा सकेगा। इससे न्यायपालिका में योग्यता को बढ़ावा मिलेगा और फैसलों को सही ढंग और तेज़ी से निपटाने की प्रवृत्ति पढ़ेगी। अभी जजों की नियुक्ति का जो तरीका है उसे केंद्र सरकार पारदर्शी नहीं मानती, उनका कहना है कि जनता को जानने का अधिकार होना चाहिए कि किसी जज की नियुक्ति क्यों और किस आधार पर की गई है। इसी मकसद से सरकार ने नेशनल ज्यूडीशियल अप्वाइंटमेंट कमीशन कानून बनाया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था।

वकीलों को जज बनाने के नियम भी खारिज

सरकार की एक सिफारिश यह भी थी कि वकीलों को सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने पर कुल नियुक्तियों के 10 फीसदी या अधिकतम 3 की सीमा तय होनी चाहिए। रिपोर्ट के मुताबिक कोलेजियम ने यह सिफारिश भी खारिज कर दी है। उसका कहना है कि हम जितना चाहें वकीलों को सीधे जज के तौर पर नियुक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं और इसकी सीमा तय नहीं की जा सकती। फिलहाल सरकार ने कोलेजियम की बातों पर जवाब देने का काम अटॉर्नी जनरल को सौंपा है।

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