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वो 10 बातें जिनसे रघुराम राजन पर शक होता है

रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यन स्वामी के टारगेट पर हैं। हर किसी के मन में यह सवाल आ रहा है कि आखिर क्या वजह है कि स्वामी ने राजन के खिलाफ इतने सख्त कमेंट्स किए हैं। हम आपको बताते हैं रघुराम राजन पर स्वामी का शक सही होने की 10 बड़ी वजहें।

1. वर्ल्ड बैंक की पसंद हैं रघुराम राजन

कुछ दिन पहले ही वर्ल्ड बैंक ने यह कहा कि अगर राजन को आरबीआई के गवर्नर पद से हटाया गया तो इसका रुपये की कीमत पर बुरा असर पड़ेगा। इसे एक तरह से विश्व बैंक की धमकी की तरह माना जा रहा है। यहां तक कहा जाता है कि विश्व बैंक की सलाह पर ही मनमोहन सरकार के वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने रघुराम राजन को आरबीआई का गवर्नर बनाया था। इससे पहले वो विश्व बैंक और अमेरिका के फेडरल रिजर्व बैंक के बड़े पदों पर रह चुके थे।

2. ‘मेक इन इंडिया’ का विरोध किया था

जब ‘मेक इन इंडिया’ को लेकर देश भर में चर्चा थी, तो राजन ने कहा कि हमें मेक फॉर इंडिया पर ज्यादा जोर देना चाहिए। इसका मतलब हुआ कि कंपनियां भारत में सामान न बनाएं, बल्कि वो दूसरे देशों से बनाकर भारत को बेचें। बस इतना ध्यान रखें कि वो सामान भारत के लोगों की जरूरत के हिसाब से डिजाइन किया गया हो।

3. आर्थिक विकास दर पर फब्ती कसी

आर्थिक विकास दर अधिक होने पर दुनिया का कोई भी देश गर्व करता है। लेकिन जब जीडीपी ग्रोथ के मामले में चीन को पछाड़ते हुए भारत नंबर-1 देश बन गया तो रघुराम राजन ने कहा कि इसे लेकर इतना खुश होने की जरूरत नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत अंधों में काने राजा जैसी है। यह बयान उन्होंने ब्रिटेन दौरे में दिया था। जिससे पूरी दुनिया में देश की किरकिरी हुई थी। अर्थशास्त्र के हर जानकार इस बात पर हैरत करते हैं कि विकास दर ज्यादा होने से रघुराम राजन आखिर खुश क्यों नहीं हैं?

4. भारत की साख को धक्का पहुंचाने की कोशिश की

ब्रिटेन दौरे में ही आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने कहा कि विदेशी बैंक भारत में अपनी शाखाएं नहीं खोल रहे हैं, क्योंकि भारत की क्रेडिट रेटिंग कम है। इससे उन्हें ज्यादा रकम की जरूरत पड़ती है। यह ऐसा बयान था, जिसने बहुतों के कान खड़े कर दिए थे। शायद ऐसा पहली बार था कि देश का प्रमुख अर्थशास्त्री सीधे-सीधे देश की साख को चोट पहुंचाने की कोशिश कर रहा था।

5. राजन ने ब्याज दरें कम नहीं होने दीं

वित्त मंत्रालय की बार-बार अपील के बावजूद रघुराम राजन ने ब्याज दरें कम नहीं होने दीं। उनकी दलील थी कि ऐसा वो इसलिए कर रहे हैं ताकि महंगाई न बढ़ने पाए। जबकि सच्चाई यह थी कि अधिक ब्याज दरों से आर्थिक गतिविधियों और निवेश पर बेहद खराब असर पड़ा। इसकी वजह से नए उद्योग-धंधे नहीं लगे और बेरोजगारी में बढ़ोतरी हुई। राजन के आलोचकों का कहना है कि वो जानबूझ कर ऐसा कर रहे थे ताकि देश की जीडीपी ज्यादा बढ़ने न पाए और भारतीय अर्थव्यवस्था चीन के नीचे ही रहे।

6. खेती को बर्बाद करने की साजिश का हिस्सा

यह आरोप अक्सर लगते रहते हैं कि भारतीय खेती को खत्म करने की एक अंतरराष्ट्रीय साजिश चल रही है। वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और अमेरिका की तमाम आर्थिक संस्थाएं यही चाहती हैं कि भारत सर्विस सेक्टर तक सिमट कर रह जाए। इस वजह से खेती और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बर्बाद करने की कोशिश चलती रही है। खुद रघुराम राजन खुलकर इस बात की वकालत करते रहे हैं कि भारत को खेती से निकलकर सर्विस सेक्टर पर फोकस करना चाहिए।

7. अमेरिका, यूरोप का बाजार बनाने की कोशिश

अमेरिका और यूरोपीय देशों की अपने प्रोडक्ट्स को बेचने के लिए भारतीय बाजार पर पैनी नज़र है। चीन के बाजार से निराश होने के बाद उनके लिए भारत ही उम्मीद की एकमात्र किरण है। अगर किसी तरह भारत को पूरी तरह सर्विस प्रोवाइडर देश बना दिया जाए तो वो अपनी जरूरत के हर सामान को खरीदने के लिए विदेशी कंपनियों के भरोसे हो जाएगा। राजन की नीतियां भी इस साजिश की समर्थक मालूम होती हैं।

8. अमेरिकी नागरिक हैं रघुराम राजन!

यह आरोप भी लगते हैं कि रघुराम राजन अमेरिकी नागरिक हैं और उनके पास अमेरिकी पासपोर्ट भी है। ऐसे में सवाल उठता है कि वो भारतीय रिजर्व बैंक के सबसे ऊंचे पद पर कैसे पहुंच गए। करीब 2 साल पहले आरटीआई के तहत उनकी नागरिकता के बारे में जानकारी मांगी गई थी। लेकिन रिजर्व बैंक ने उसका जवाब देने से इनकार कर दिया था। बीजेपी के सीनियर लीडर मुरली मनोहर जोशी भी एक बार लोकसभा में राजन की नागरिकता पर सवाल पूछ चुके हैं।

9. मीडिया में बने रहने के शौकीन हैं रघुराम राजन

राजन देश के पहले ऐसे आरबीआई गवर्नर थे, जिनकी नियुक्ति के वक्त अखबारों और टीवी चैनलों पर उनका जोरदार महिमामंडन किया गया था। आर्थिक अखबारों ने तो उन्हें 007 जेम्स बॉन्ड तक कह डाला था। रिजर्व बैंक के गवर्नर जैसे लो-प्रोफाइल पद के लिए ऐसी मीडिया कवरेज भी कहीं न कहीं शक पैदा करती है।

10. राजन के पक्ष में जबर्दस्त लॉबिंग

एक आरबीआई गवर्नर को दूसरे कार्यकाल में जारी रखने के लिए मीडिया से लेकर देश और दुनिया की आर्थिक संस्थाओं का लॉबिंग करना भी थोड़ा शक पैदा करता है। कई अंग्रेजी अखबार अभी से रघुराम राजन के पक्ष में बड़े-बड़े फीचर्स छाप रहे हैं और बता रहे हैं सुब्रह्मण्यन स्वामी ने उनका विरोध करके क्यों बहुत बड़ी गलती की है। जाहिर है ऐसा जब भी होता है दाल में कुछ न कुछ काला जरूर होता है।

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