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टीना डाबी या रोहित वेमुला- क्या बनना चाहेंगे दलित युवा?

वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की फेसबुक वॉल से साभार
वरिष्ठ पत्रकार अभिरंजन कुमार की फेसबुक वॉल से साभार
क्या संयोग है! देश में आजकल दो दलितों की काफी चर्चा है, पर अलग-अलग वजहों से।
एक हैं टीना डाबी। मात्र 22 साल की। पहले ही प्रयास में सिविल सेवा परीक्षा में सर्वोच्च स्थान हासिल कर दिखा दिया कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए। जो चाहा सो कर दिखाया। अब वो देश की ब्यूरोक्रेसी में शीर्ष तक जाएंगी। अपने वतन के लिए नीतियां बनाएंगी। प्रशासन संभालेंगी। और भी बहुत कुछ करने के मौके उनके पास होंगे।
उन्हें देखने के बाद अब किसकी हिम्मत होगी कि दलितों को कमतर निगाह से देख ले? वह देश में दलित युवाओं की ताकत, प्रतिभा, मान-सम्मान और उत्थान की प्रतीक बन गई हैं। जिस वक्त देश के शातिर जातिवादी लोग अपने सियासी फायदे के लिए हमारे दलित नौजवानों में ठूंस-ठूंस कर हीन भावना और वंचित होने का बोध भरने में जुटे थे, उसी वक्त टीना डाबी ऊंचे मनोबल के साथ लक्ष्य-प्राप्ति के लिए समर्पित होकर काम कर रही थीं।
दूसरा था रोहित वेमुला। 26 साल का। भले हमारे लोकतंत्र में उसकी आस्था कुछ कम थी, लेकिन तमाम कमियों के बावजूद इसी लोकतंत्र ने उसे भी आगे बढ़ने के तमाम मौके मुहैया कराए थे। हैदराबाद यूनिवर्सिटी में पीएचडी करने तक पहुंचा वह और सरकारी फेलोशिप भी मिलती थी उसे। बहुत कुछ बनने का सपना उसने भी देखा था, लेकिन वह टीना डाबी की तरह लक्ष्य के प्रति समर्पित नहीं रह सका और रास्ता भटक गया।
वह हैदराबाद के सांप्रदायिक और देश-विरोधी नेताओं के जाल में फंस गया। नफ़रत और नकारात्मक सोच ने उसे जकड़ लिया। एक पीएचडी स्कॉलर का बौद्धिक दिवालियापन देखिए कि अंबेडकर का नाम लेकर वह मुंबई में सैकड़ों लोगों की हत्या के गुनहगार आतंकवादी याकूब मेमन के समर्थन में आंदोलन करने निकल पड़ा था। जिस रास्ते पर वह चला गया, उसपर सिर्फ़ और सिर्फ़ साज़िशें होती हैं और हर आदमी की जान शातिर सियासतदानों और अपराधियों का मोहरा मात्र होती है।
इसलिए एक दिन पता चला कि रोहित ने आत्महत्या कर ली। हो सकता है कि अवसाद का शिकार होकर उसने सचमुच आत्महत्या ही की हो, पर यह भी हो सकता है कि जिन लोगों को उसकी मौत से फायदा होने वाला था, उन्होंने ही अपने सियासी फायदे के लिए उसे फांसी चढ़ा दिया हो या फांसी पर चढ़कर भगत सिंह बन जाने का पागलपन भरा नुस्खा बता दिया हो। जो भी हो, रोहित के साथ गलत हुआ। लेकिन यह गलत इसलिए हुआ, क्योंकि वह गलत रास्ते पर चला गया था।
जो लोग मासूमों की लाशों पर भी राजनीति कर लेते हैं, उनका क्या जाता है? वे तो “चढ़ जा बेटा सूली पर” कहते हुए नौजवानों को मरने-मारने के लिए उकसा ही सकते हैं। कोई रोहित मरेगा, तभी तो उसकी चिता पर रोटियां सेकेंगे वे। इसलिए उसकी मौत पर गंदी जातिवादी राजनीति का सिलसिला लंबा चला। सत्ता-विरोध और व्यवस्था-विरोध के नाम पर दलित नौजवानों में नफ़रत और नकारात्मकता भरी गई। उनमें कूट-कूट कर यह अहसास भरा गया कि तुम कमतर हो और अगर तुम आगे बढ़ना चाहोगे तो देश के संस्थान तुम्हारी जान ले लेंगे। आतंकवादियों का बचाव, समर्थन और महिमामंडन करने वाले लोगों के साथ उनका टाइ-अप कराने की कोशिश की गई, ताकि उनकी युवा-ऊर्जा को देश के विरोध में इस्तेमाल कर देश में अराजकता का माहौल पैदा किया जा सके।
रोहित की मौत से पहले और उसके बाद एक बहुत बड़ी साज़िश रची गई, जिसके कई अध्याय अब भी बाकी हैं। मुझे आशंका है कि इसमें पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से लेकर भारत के कई घाघ सांप्रदायिक दलों का गठबंधन काम कर रहा है। इस गठबंधन से सांप्रदायिक दलों ने सत्ता हासिल करने का और आईएसआई ने भारत में विखंडन की परिस्थितियां पैदा करने का मंसूबा पाल रखा है।
बहरहाल, अब हमारे युवा दलित भाइयों-बहनों को तय करना है कि वे टीना डाबी के रास्ते पर चलकर अपनी और देश की तरक्की का रास्ता खोलेंगे या फिर रोहित वेमुला के रास्ते पर चलकर अपनी और देश की बर्बादी की कहानी लिखेंगे। पर इतना तय है कि जो सकारात्मक ऊर्जा से भरा होगा, वह टीना डाबी की तरह ऊंचाइयों को प्राप्त करेगा और जो नकारात्मक ऊर्जा का शिकार हो जाएगा, वह रोहित वेमुला के हश्र को प्राप्त करेगा।

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