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न्यूज़ चैनल वालों तुम हमें ये क्या दिखा रहे हो?

pragyaपत्रकारिता की कक्षा में मेरे एक मित्र ने कहा था, “तुम क्रांतिकारी बनने आयी हो?”, मैं वो बात कभी भूल नहीं पाती। ये बात एकदम सच है कि मैं पत्रकार ढंग से बन ही नहीं पायी क्योंकि मुझे कुछ भी समझ आता ही नहीं था। मुझे लीक पे चलना नहीं आता था। जैसे की मैंने आईआईएमसी के एक काफी सीनियर अध्यापक से पूछ लिया था कि आप जो पढ़ाते हैं वो न तो मुझे समझ आता है न मुझे ये समझ आता है की इसकी ज़रुरत ही क्या है, फिर आप इसे पढ़ाते क्यों हैं? वो बस प्यार से ज़ोर से हंस दिए।
अब इतने साल बाद सवाल पहर वही हैं, मैं भी वही हूँ, आज भी मुझे बहुत कुछ समझ नहीं आता जैसे कि जब हम सरकार चुनते हैं तो टीवी पर रात दिन चिल्लपों किस बात पे होती है। सिर्फ नंबर गेम, उठापटक, तमाशे, खरीद फरोख्त। क्या हम सरकार इसके लिए चुनते हैं?
आज की बात करें तो मैं देखना चाहती हूँ कि सरकार क्या काम कर रही है? पीयूष गोयल, मनोहर पर्रीकर, सुषमा स्वराज, नितिन गडकरी या फिर सुरेश प्रभु ये सब कितना काम कर रहे हैं या नहीं कर रहे? एक कोई साध्वी प्राची जो पता नहीं कौन सी पार्टी की हैं उनके बयान से मेरा क्या लेना-देना? कौन है वो? रात-दिन डिग्री का हंगामा, क्या ज़रुरत है? दिखाइए पर मुझे मेरे देश और मेरे राज्य की सरकारों की बाकी रिपोर्ट तो दिखाइए।
मुझे नंबर गेम के अलावा ये भी तो बताइए कि जंगल कट रहे हैं तो नए लग भी रहे हैं या नहीं।
मुझे दिखाइए कि लातूर में बारिश आई थी तो क्या हुआ?
मुझे सरकार के नए पुराने कार्यक्रम दिखाइए और विपक्ष की बातें भी दिखाइए। मुझे जज करने दीजिये कि कौन-सी सरकार वो काम कर रही है जिसके लिए आयी है। दिन-रात का शोर-शराबा मुझे समझ ही नहीं आता। मुझे आज भी इसकी ज़रूरत समझ नहीं आती।
पर आज कोई सामने नहीं है जिससे ये कहूं कि “सर अब तो मैं और भी कंफ्यूज हो चुकी हूँ। अब तो मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा।”

(प्रज्ञा बड़थ्वाल के फेसबुक पेज से साभार, प्रज्ञा इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन में पत्रकारिता की छात्रा रही हैं। अब पत्रकारिता का पेशा छोड़कर वो एक ऐड एजेंसी चलाती हैं)

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