‘चुप रहने’ के लिए मीडिया में किसने खाए 45 करोड़?

तस्वीर में ऊपर बरखा दत्त, राजदीप सरदेसाई और नीचे भूपेंद्र चौबे और राजू संथानम हैं।

अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में सोनिया गांधी समेत कांग्रेस के बड़े नेताओं को 125 करोड़ रुपये रिश्वत मिलने की बात के बाद एक और बड़ा खुलासा हुआ है। यह पता चला है कि सौदे के बिचौलिए ब्रिटिश नागरिक क्रिश्चियन मिशेल को कंपनी ने 45 करोड़ रुपये दिए थे ताकि भारतीय मीडिया को ‘मैनेज’ किया जा सके। आरोप है कि यह पैसा भारतीय मीडिया संस्थानों को दिया गया है ताकि वो इस मामले पर अपना मुंह बंद रखें। फिलहाल मिशेल फरार है और भारतीय जांच एजेंसियां उसकी तलाश में हैं।

इटली की हाईकोर्ट में आरोप साबित

दरअसल भारतीय मीडिया को 45 करोड़ रुपये दिए जाने की बात सिर्फ आरोप ही नहीं है। इटली में मिलान की अदालत में अलग-अलग काम के लिए बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल को 330 करोड़ रुपये के भुगतान की बात साबित भी हुई है। वीवीआईपी अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टरों का सौदा 2009 में मनमोहन सिंह सरकार के वक्त हुआ था, जबकि ‘भारतीय मीडिया को मैनेज करने’ के लिए 45 करोड़ रुपयों का भुगतान जनवरी 2010 में किया गया।

फाइवस्टार होटल में ‘मैनेज’ हुआ मीडिया

इटली की अदालत में चले केस के मुताबिक क्रिश्चियन मिशेल दिल्ली के फाइवस्टार द क्लैरिजेज़ (The Claridges) होटल में ठहरा था। यहां पर उसकी भारतीय मीडिया के कई बड़े लोगों और कुछ ब्यूरोक्रेट्स के साथ मीटिंग हुई। 2010 से 2013 तक भारतीय मीडिया ने इतने बड़े रक्षा सौदे को लेकर चल रहे विवादों पर एक भी शब्द नहीं लिखा। इनमें ज्यादातर बड़े अखबार और टीवी चैनल शामिल हैं। 2013 में जब इटली की जांच एजेंसी ने हेलीकॉप्टर बनाने वाली कंपनी फिनमेकेन्निका के चीफ को गिरफ्तार कर लिया तब जाकर भारतीय मीडिया में पहली बार यह खबर आई कि डील को लेकर धांधली के आरोप लगे हैं।

बरखा और राजदीप सरदेसाई देंगे जवाब?

किन लोगों तक 45 करोड़ रुपये पहुंचे? इस सवाल का जवाब भारतीय मीडिया के दो बड़े चेहरों राजदीप और बरखा से पूछा जा रहा है। द हिंदू अखबार ने 27 अप्रैल के अपने अंक में क्रिश्चियन मिशेल के कथित तौर पर पीएम मोदी को लिखी एक चिट्ठी को छापा था। इस चिट्ठी की पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है, लेकिन कुछ बड़े पत्रकार इस चिट्ठी में लिखी बातों को तूल देने की कोशिश करते रहे। यह सवाल भी आता है कि इस लेटर को मीडिया को किसने लीक किया? दूसरा सवाल ये कि अगर ये चिट्ठी असली है तो इसमें क्रिश्चियन मिशेल ने अपना पूरा नाम लिखने की बजाय सिर्फ खुद को सिर्फ ‘James’ क्यों लिखा है? बरखा और राजदीप को कैसे यह बात पता चल गई कि जेम्स ही क्रिश्चियन मिशेल है? कहीं ऐसा तो नहीं कि भारतीय मीडिया को ‘मैनेज’ करने के लिए दिए गए 45 करोड़ रुपए असर दिखा रहे हैं? राजदीप सरदेसाई ने ट्वीट करके कहा है कि वो मीडिया के उन नामों के बारे में जानना चाहते हैं। यह कैसे संभव है कि इतनी बड़ी रकम की लेनदेन हुई हो और संपादक को ही खबर न हो।

एक पत्रकार से ईडी कर चुका है पूछताछ

2010 से 2012 तक करोड़ों रुपये भारतीय मीडिया में बांटे गए, लेकिन मामले की जांच कर रहे इनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) ने अब तक सिर्फ एक पत्रकार राजू संथानम से पूछताछ की है। यह पूछताछ पिछले साल के जनवरी या फरवरी महीने में हुई थी। अपने बयान में राजू संथानम ने माना है कि उन्होंने क्रिश्चियन मिशेल से ‘फेवर्स’ लिए थे। माना जा रहा है कि ईडी इस केस में उन्हें गवाह बना सकती है। बाकी पत्रकारों के बारे में अभी तक कोई पक्की जानकारी नहीं है कि उन्हें भी जांच के दायरे में रखा गया है या नहीं।

हथियारों के दलाल अभिषेक वर्मा का हाथ

यह बात भी सामने आई है कि जेल में बंद हथियारों के कुख्यात दलाल अभिषेक वर्मा का भी इस डील में अहम रोल था। क्रिश्चियन मिशेल के लिए दिल्ली में ग्राउंड वर्क उसी ने किया था। उसी ने मिशेल को दिल्ली में बड़े पत्रकारों से मिलवाया। अभिषेक वर्मा के पिता श्रीकांत वर्मा खुद पत्रकार और कांग्रेस के नेता रहे हैं। वो दो बार राज्यसभा में भी रह चुके हैं। 1970 के दशक में श्रीकांत वर्मा राजीव और सोनिया गांधी को हिंदी पढ़ाया करते थे। उनकी पहचान गांधी परिवार के सबसे विश्वस्त लोगों में होती थी। लेकिन भारतीय मीडिया के कुछ दिग्गज बार-बार अभिषेक वर्मा को क्लीनचिट देते रहे हैं। तब CNN-IBN चैनल के पत्रकार भूपेंद्र चौबे ने तो बाकायदा ट्वीट करके कहा था कि अभिषेक वर्मा का कोई लिंक नहीं है। सवाल यह भी उठता है कि मीडिया के कुछ दिग्गजों को इस केस में आखिर इतना इंटरेस्ट क्यों था? और क्यों वो जांच को भटकाने की बचकानी कोशिशें कर रहे थे?

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पीएम मोदी को लिखे क्रिश्चियन मिशेल के कथित पत्र के कुछ पन्ने

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(वेबसाइट https://www.pgurus.com/ से कुछ इनपुट्स लिए गए हैं)

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