सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियां देख आपको भी रोना आएगा!

अदालतों में काम के बोझ का जिक्र करते-करते देश के चीफ जस्टिस रो पड़े। ये देखकर हर किसी के मन में सवाल आता है कि क्या वाकई स्थिति इतनी खराब है। मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर का यह कहना बिल्कुल सही है कि देश में जजों की कमी है, साथ ही नई अदालतें बनाने में तेज़ी की जरूरत है। लेकिन इस सिलसिले में कुछ सवाल हैं जो न्यायपालिका पर हमेशा से उठाए जाते रहे हैं। यह सवाल अदालतों में होने वाले कथित भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि जजों को मिलने वाली छुट्टियों पर है।

साल 2016 में कुल 134 छुट्टियां!

दरअसल सुप्रीम कोर्ट में जितनी छुट्टियां होती हैं, उतनी शायद ही किसी दूसरी नौकरी में मिलती हों। इस साल के सुप्रीम कोर्ट के कैलेंडर को ही देखें तो इसमें साप्ताहिक छुट्टियों के साथ कुल 134 छुट्टियां हैं। यानी 2 दिन काम करने पर 1 दिन की छुट्टी। इसके अलावा सरकारी नियमों के तहत जजों को जो पर्सनल छुट्टियां मिलती हैं वो अलग। स्कूलों के अलावा अदालतें इकलौती संस्था हैं जो मई-जून में 45 दिन की गर्मी और दिसंबर में 14 दिन जाड़े की छुट्टी के नाम पर बंद रहती हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के मुकाबले हाई कोर्ट और हाई कोर्ट्स के मुकाबले लोअर कोर्ट्स में छुट्टियां कम हैं। लेकिन निचली अदालतों में जजों के वक्त पर न आने, अचानक छुट्टी पर चले जाने और समय-समय पर होने वाली हड़ताल की समस्या काफी बड़ी है।

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दो साल पहले कम हुई थी गर्मी की छुट्टी

2014 में उस वक्त के चीफ जस्टिस आररएस लोढ़ा की पहल पर न्यायपालिका की कुछ छट्टियां कम की गई थीं। जैसे कि गर्मी की छुट्टी अधिकतम 7 हफ्ते कर दी गई, जो पहे 10 हफ्ते तक हो सकती थी। सुप्रीम कोर्ट की छुट्टियों के ढांचे में यह बदलाव भी पूरे 50 साल के बाद मुमकिन हो पाया था। 2009 में लॉ कमीशन ने भी ऊपरी अदालतों में 10 से 15 दिन की छुट्टी कम करने की सिफारिश की थी।

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लंबी छुट्टियों पर क्या है कोर्ट की दलील

जब भी यह बात होती है कि न्यायपालिका में छुट्टियां कुछ ज्यादा ही मिलती हैं तो यह दलील दी जाती है कि जज छुट्टियों में कहीं घूमने नहीं जाते। वो इस दौरान फैसले लिखने और अपनी जानकारी बढ़ाने में करते हैं।

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