भारतीय न्यायपालिका और जस्टिस के एम जोसेफ

भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी खूबी उसकी स्वतंत्रता और लोकतंत्र के प्रति उसकी प्रतिबद्धता है। हमारी अदालतें जनता के इस विश्वास को बनाए रखने में सफल भी रही हैं। हालांकि अदालत के कुछ फैसले और कभी-कभी कुछ जजों का व्यवहार सवालों के दायरे में आता रहता है।

चर्चा में उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस

उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन हटाने और राष्ट्रपति के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करने वाले उत्तराखंड के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ आजकल चर्चा का विषय बने हुए हैं। पिछले साल वो तब चर्चा में आए थे, जब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की बुलाई बैठक में आने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि गुड फ्राइडे के दिन सम्मेलन क्यों रखा गया।

पहले भी विवादों में रहे हैं जस्टिस जोसेफ

लंबे समय तक वकालत के बाद 2004 में जोसेफ को केरल हाई कोर्ट का जज बना दिया गया। उसके बाद करीब 10 साल तक वो एक ही कोर्ट में रहे। 2014 में उन्हें उत्तराखंड हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस नियुक्त कर दिया गया। केरल हाई कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान उन पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे। 2008 में उन्हें अज्ञात व्यक्ति से रेफ्रीजरेटर तोहफे के तौर पर लेने पर जुर्माना भी भरना पड़ा था। उन्होंने अपनी सालाना संपत्ति घोषणा में इसे छिपाया था।

कांग्रेस नेताओं के पक्ष में दिए कई फैसले

  • 2011 में जस्टिस जोसेफ ने पामोलिन आयात घोटाले में केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी को क्लीन चिट दे दी थी। जबकि इस बात के सबूत कोर्ट में पेश किए गए थे कि एक प्राइवेट कंपनी को 15% कमीशन दिया गया है।
  • 2013 में जस्टिस केएम जोसेफ ने केरल में सोलर पैनल घोटाले की न्यायिक जांच कराने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि राज्य में जजों की कमी है।

पिता केके मैथ्यू सुप्रीम कोर्ट के जज थे

जस्टिस जोसेफ जस्टिस केके मैथ्यू के बेटे हैं, जो खुद भी सुप्रीम कोर्ट के जज थे। वो इमर्जेंसी के वक्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश थे और 1976 में ही रिटायर हो गए थे। इसके बाद 1980 में इंदिरा गांधी ने उन्हें पहले और इसके बाद दूसरे प्रेस आयोग का चेयरमैन बनाया था। इसके बाद वो लॉ कमीशन के भी अध्यक्ष रहे।

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