कश्मीर में पीटे गए छात्र का देश के नाम खुला खत

सत्यम कुमार

सत्यम कुमार

आंखों में आंसू लिए और रुंधे हुए गले से एक बार कहना चाहता हूं।
तेरा वैभव अमर रहे मां हम दिन चार रहें न रहें।
मेरे स्कूल के दिनों में जब मैं क्लास 6 में था तो एक बार सीनियर हॉस्टल में क्लासवाइज लड़ाई हो गई थी, मामला ज्यादा बढ़ा था तो पीएसी बुलाई गयी थी। सुबह हम लोगों को पता चला की रात में खूब दौड़ा-दौड़ा के पीटा गया था सीनियर्स को। कुछ को अस्पताल भी ले जाना पड़ा था। हम लोग काफी डर गए थे, सोच रहे थे कितना दौड़ाया होगा। जो लोग बच गए होंगे उनको कितना तेज भागना पड़ा होगा।
आज जाके मालूम पड़ा।
आज का दिन एनआईटी श्रीनगर में ख़ूनी रहा।
मैच को लेकर जो भी एनआईटी श्रीनगर में हुआ था, उसके बाद जो कश्मीरी प्रोफ़ेसर थे वो हमें हमारे करियर को लेकर डरा रहे थे कि वो हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ करेंगे। हमने यहां जो भी किया उसके पहले हमारी प्राथमिकता ये थी कि हम यहां पढ़ने आये थे, हमारे कुछ सपने हैं, जो हमारे परिवार से भी जुड़े हैं जिनको पूरा करने हम आये हैं। प्रोफेसर्स की इन धमकियों से हम काफी डर गए थे कि अब हमारा क्या होगा। जिसके लिए उस दिन के बाद हमने अपनी कुछ मांगों को लेकर लगातार तीन दिन हड़ताल की। लेकिन कॉलेज प्रशासन मीडिया को मेन गेट के अंदर आने ही नहीं दे रहा था। वो वही से उन्हें यह कहकर वापस भेज दे रहे थे कि सबकुछ ठीकठाक है। क्लासेस चल रही हैं और सिचुएशन नार्मल है। लेकिन रियलिटी तो कुछ और ही है। अंदर हम लगातार हो रही बारिश में भीग कर हड़ताल कर रहे थे पर कोई पूछने वाला नहीं था और हमें हमारे हॉस्टल गेट से बाहर नहीं निकलने दिया जा रहा था। हमारी हड़ताल में कोई ये तक नहीं पूछने आया कि आखिर हम चाहते क्या हैं, हमारा मुद्दा ये था कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय से कोई अधिकारी आए और हम उनके सामने अपनी बात को रख सके जोकि हमारी खुद की और हमारे भविष्य की सुरक्षा से सम्बंधित था। मैं आपको बता दूं कि हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है कश्मीर में मीडिया का न होना, कुछ हैं, उसमे से कुछ या तो हमारे खिलाफ लिखने वाले हैं और कुछ जो लिखना चाहते हैं उन्हें हम तक आने ही नहीं दिया जा रहा था। आज तक कोई भी मीडिया हमारे तक नहीं आई है। न्यूज़ पेपर्स में या न्यूज़ चैनल्स पर जो भी दिखाया गया है वो सब हमारे द्वारा सोशल साइट्स पर डाले गए वीडियो या फिर इनफार्मेशन का नतीजा है।
ऐसे ही आज भी हम हड़ताल पर बैठे हुए थे, शाम 3 बजे हमें सूचना मिली कि मेन गेट पर कोई न्यूज़ चैनेल वाले आये हैं और हमसे मिलना चाहते हैं, बस इतना सुनना था कि जितने भी गैर-कश्मीरी छात्र थे सभी मेन गेट की तरफ चले आए। लगभग सभी लोग इकठ्ठा हो गए, क्योंकि हम चाहते थे कि जल्दी से जल्दी हमारी बात ऊपर तक पहुचे और उसका हल निकले जिससे कि हमारी पढाई-लिखाई शुरू हो सके। जम्मू और कश्मीर पुलिस और इंडियन आर्मी लगातार हमारे कैंपस में बने हुए हैं। जब हम लोग मेन गेट पर पहुचे तो पता चला वहां कोई मीडिया नहीं आई हुई थी, हमें गलत सूचना मिली थी। अचानक भीड़ को देख कश्मीरी पुलिस एक्टिव हो उठी। वो हमें पीछे की ओर धकेलने लगी। हमने कहा कि हम मीडिया से मिलने आये थे पर उन्होंने हमारी एक नहीं सुनी। हमने प्रोटेस्ट किया तो तुरंत हम पर लाठीचार्च कर दिया। हम लोग हजारों की संख्या में थे। भागने लगे तो कोई फिसला, किसी की पीठ पर लाठी पड़ी वो वही गिर गया और एक को पांच-पांच पुलिसवालों ने मिलकर पीटा। इस भगदड़ में लगभग 40 छात्रों को खूब पीटा गया। लाठी से किसी के सर में मारा, तो किसी के हाथ में, किसी के पैर में मारा तो किसी के गर्दन में, किसी को मारने से चोट लगी, कोई गिरकर चोट खा गया। जो जहां गिरा उसको वहां तब तक पीटा गया जब तक कि उनका मन नहीं भर गया। मै भाग रहा था तब तक मेरी चप्पल मेरे पैर से निकल गई। मुड़कर चप्पल के पास देखा तो वहां से बस दो कदम पीछे गिराकर एक बन्दे को पीट रहे थे। उसके सिर से खून निकल रहा था फिर भी उसे पीट रहे थे। हम भागते-भागते हॉस्टल तक आये और ‘कश्मीर पुलिस हाय हाय’ और ‘We Want MHRD’ के नारे लगाने लगे। नारे लगाते लगाते जब फिर से हॉस्टल कैंपस से बाहर कॉलेज कैंपस में आये तो फिर से हमारे ऊपर लाठीचार्ज किया गया। इस बार तो पहले से भी ज्यादा बेरहमी से पीटा गया, एक विकलांग लड़का जोकि मेस से चाय पीकर वापस जा रह था उसे भी पीट दिया। मारते-मारते हमारे हॉस्टल में घुस गए उसके बाद वहां उन्हें जो मिला सबको पीटते चले गए। लाठियां जहां मारीं वहां जिंदगी भर के लिए निशान दे दिया। हर तरफ से बस यही दिखाई दे रहा था कि कोई लंगड़ाता हुआ आ रहा है तो कोई रोता हुआ आ रहा है, कोई उठाकर लाया जा रहा है। इस तरह से आज का दिन हमारी जिंदगी के लिए खूनी साबित हो गया। लगभग 50 ज्यादा बच्चों को चोटें आई जिनमे से तीन आईसीयू में भर्ती हैं। एक लड़के के दोनों हाथ टूट गए। एक लड़के का एक पैर और एक हाथ टूट गया। कितनों के पीठ में खतरनाक घाव आए हैं। किसी की आंख सूजी हुई है तो कोई चल नहीं पा रहा। किसी भी कानून में ये नहीं लिखा कि लाठीचार्ज में कमर के ऊपर मारा जाए। हमने इंडियन आर्मी से उनके ख़ामोशी का कारण पूछा तो उन्होंने बताया ऊपर से ऑर्डर नहीं हैं। फिर भी हमने इंडियन आर्मी जिंदाबाद के नारे लगाये। जल्दबाजी में एम्बुलेस आई, माइनर चोट वालों को कॉलेज हॉस्पिटल में और गंभीर चोट वालों को JLN हॉस्पिटल में ले जाया गया। अभी थोड़ी देर पहले मैंने ज़ी न्यूज़ देखा, जिसमें दिखाई गई बातें सही तो हैं पर वास्तविकता की हद से कम हैं। उन्होंने तो बस हमारी तरफ से इंटरनेट पर डाला गया बस एक वीडियो दिखाया है, जबकि उससे पता नहीं कितने गुना ज्यादा दिल दहलाने वाले वीडियो मौजूद हैं, जिसमें अबोध छात्रों को बर्बरता पूर्वक पीटा जा रहा है।
आखिर हमारी गलती क्या है, यही कि हम देश के अपमान को नहीं सह सके? यही कf हमने तिरंगे को झुकने नहीं दिया? हमने देश का विरोध करने वालों का, खुद को खतरे में डालते हुए भी सामना किया। बदले में हमें क्या मिला… घाव। कुछ लोग JNU में देशविरोधी नारे लगाते हैं वो हीरो बन जाते हैं, हमने यहां की संवेदनशील परिस्थिति में भी देशद्रोहियों का विरोध किया तो हम पर लाठियां बरसाई गईं।
JNU में तो बस देशविरोधी नारा लगा था और मीडिया कवरेज ने उसे जबरदस्त मुद्दा बनाया, यहां तो हमारी जान पर बन आई है और कोई मीडिया नहीं, कोई लिखने वाला नहीं हम पर, आखिर क्या कर रही है वो सरकार जो हमारी मदद कर सकती है। हम खुद ट्वीट कर-करके खुद को ट्रेंड में ले आए, ताकि हमारा मामला सभी तक पहुंचे। हम खुद के मीडिया बने। लिखने वालों ने तो JNU में कंडोम और सिगरेट के टुकड़ों की संख्या तक का पता लगा लिया था। वहां मीडिया अंदर जा सकती थी पुलिस ने तीन दिन तक बाहर खड़े होकर गिरफ्तारी के लिए इंतज़ार किया था। यहां पर मीडिया बाहर और पुलिस छात्रों पर लाठियां भांज रही है। हमने शायद कुछ अच्छा किया और अभी तक हम जो चाहते थे वो नहीं हो सका पर बदले में मिली चोट। पर कहीं न कहीं खुद को हम खुशनसीब मानते हैं कि अपने देश के काम आ सके। विरोध करने वालों का खुलकर सामना किया।
माँ भारती तू रहे सुरक्षित, हम तो कैसे भी रह लेंगे।
रोज हॉस्टल में काफी शोर होता था, पर आज काफी शांति है। ये सन्नाटा अपने आप में बहुत बड़े डर को दबाये हुए है। आज इतना खतरनाक हुआ तो आगे और क्या हो सकता है। पर हम रुकेंगे नहीं जब तक हमारी डिमांड पूरी नहीं की जातीं हड़ताल जारी रहेगी। मैं अपनी इस पोस्ट को पढ़ने वाले सभी लेखनी के धुरंधरों से अनुरोध करना चाहूंगा कि हमारे बारे में भी वो लिखे और इसी तरह से ही सही इस मुद्दे पर कुछ अच्छा हो इस प्रकार का दबाव डालें।

लव यू इंडिया… वन्देमातरम
सत्यम कुमार
बीटेक (कंप्यूटर साइंस छात्र), एनआईटी, श्रीनगर

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