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जब दलित अत्याचार पर मीडिया का झूठ पकड़ा गया!

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में तीन दलित लड़कों की पिटाई के मामले में सच्चाई सामने आ गई है। टाइम्स ऑफ इंडिया, एनडीटीवी, दैनिक भास्कर समेत कई बड़े मीडिया समूहों ने इस मामले में झूठी खबर प्लांट की थी। कई चैनलों और अखबारों ने दावा किया था कि तीनों दलित बच्चों की बुरी तरह पिटाई करने वाले ‘ऊंची जाति के लोग’ हैं। चित्तौड़गढ़ के एसपी पीके खेमसारा ने इस दावे को गलत बताया है। उन्होंने बताया कि इस मामले में कुल छह आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं। इनमें से 4 दलित हैं। इस मामले का जाति से कोई लेना-देना नहीं है। आरोपियों ने तीनों नाबालिग लड़कों को बाइक चोरी का आरोप लगाकर बुरी तरह मारा-पीटा था।

दिल्ली की मीडिया ने रची झूठी कहानी

दिल्ली के ज्यादातर अखबारों और चैनलों ने इसे दलित अत्याचार के मामले की तरह दिखाया। इनमें टाइम्स ऑफ इंडिया, दैनिक भास्कर, एनडीटीवी, ज़ी न्यूज़ और फर्स्टपोस्ट सबसे आगे रहे। यह दावा भी किया गया कि पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कोई केस दर्ज नहीं किया है। जबकि यह बात सच नहीं है।

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दलित अत्याचार की इस भ्रामक खबर को फैलाने में कई जाने-माने लोगों ने भी भरपूर मदद की। आम आदमी पार्टी से जुड़ी न्यूज़ वेबसाइट ‘जनता का रिपोर्टर’  और न्यूज़लॉन्ड्री.कॉम नाम की वेबसाइट चलाने वाले प्रशांत सरीन ने भी इस झूठी खबर को शेयर किया। पहली नज़र में इसका मकसद जातियों के बीच में नफरत फैलाना लग रहा है। क्योंकि सच्चाई सामने आने के बाद भी किसी चैनल, अखबार या वेबसाइट ने अपनी गलती के लिए माफी नहीं मांगी है।

आम आदमी पार्टी से जुड़ी न्यूज वेबसाइट जनता का रिपोर्टर और  कई जाने-माने पत्रकारों ने भी झूठ फैलाने की कोशिश की।
आम आदमी पार्टी से जुड़ी न्यूज वेबसाइट जनता का रिपोर्टर और कई जाने-माने पत्रकारों ने भी झूठ फैलाने की कोशिश की।

इंडियन एक्सप्रेस अखबार के राजस्थान संवाददाता महिमप्रताप सिंह ने ट्विटर पर यह बात बताई है कि अत्याचार करने वालों में 4 दलित हैं।

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