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प्रशांत किशोर की वजह से कांग्रेस में फूट की नौबत!

चुनावी रणनीति के एक्सपर्ट के तौर पर पहचान बना चुके प्रशांत किशोर को लेकर कांग्रेस के अंदर खींचतान शुरू हो गई है। उन्हें यूपी और पंजाब में कांग्रेस की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी के सूत्रों के मुताबिक यूपी और पंजाब के कई दिग्गज नेता प्रशांत किशोर के काम करने के स्टाइल से खुश नहीं हैं। कहा जा रहा है कि प्रशांत अभी सीधे राहुल गांधी को रिपोर्ट करते हैं और राज्य स्तर के नेताओं को ज्यादा भाव नहीं देते।

प्रशांत किशोर को लेकर क्यों नाराजगी?

बिहार के रहने वाले प्रशांत किशोर पारिवारिक रूप से आरएसएस के करीबी रहे हैं। इसलिए पुराने कांग्रेसी दिग्गज उनके तहत काम करने में असहज महसूस कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक राहुल गांधी ने दोनों राज्यों के नेताओं से कह रखा है कि चुनाव के बारे में कोई भी कदम उठाने से पहले प्रशांत किशोर से अनुमति जरूर लें। इस वजह से जमे-जमाए कांग्रेसी नेताओं को लग रहा है कि अब वो दोयम दर्जे के नेता बनकर रह गए हैं।

यूपी चुनाव को लेकर रणनीति पर विवाद

सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर यूपी में ब्राह्मण वोटरों पर फोकस करने के पक्ष में हैं। इसी रणनीति के तहत वो शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट करने की वकालत कर रहे हैं। प्रशांत की दलील है कि नीतीश कुमार की मदद से वो कुर्मी और कुछ दूसरी ओबीसी जातियों को कांग्रेस की तरफ मोड़ने में कामयाब रहेंगे। मधुसूदन मिस्त्री और मोहन प्रकाश जैसे नेता इस रणनीति के सख्त खिलाफ हैं। उन्हें लग रहा है कि खुद ब्राह्मण होने की वजह से प्रशांत किशोर का झुकाव ब्राह्मणों की तरफ ज्यादा है। कांग्रेस नेताओं की दलील है कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ 10 फीसदी ब्राह्मण हैं और उन पर फोकस बढ़ते ही दलित और मुस्लिम वोटर छिटक जाएंगे।

प्रशांत किशोर की काबिलियत पर भी सवाल

दिल्ली में कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि प्रशांत किशोर अब तक जीतने वाले घोड़ों पर दांव लगाते आए हैं, उनकी कामयाबी की असली वजह यही है। पंजाब में तो फिर भी अमरिंदर सिंह का चेहरा है, लेकिन यूपी में कांग्रेस की राह बेहद मुश्किल है। प्रशांत किशोर चाहते हैं कि यूपी में चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी पर हमला बोला जाए और उसे ही मुख्य प्रतिद्वंदी के तौर पर लिया जाए। यह बात कांग्रेस के लोकल नेता हजम नहीं कर पा रहे। उनका कहना है कि बीएसपी और समाजवादी पार्टी को नजरअंदाज करना बड़ी भूल साबित हो सकती है।
(सिद्धार्थ शर्मा)

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