गुमनामी बाबा ही थे नेताजी सुभाषचंद्र बोस!

दायीं तरफ की तस्वीर गुमनामी बाबा की है। हालांकि यह असली फोटो नहीं, बल्कि उनके निधन के बाद लोगों की याददाश्त के आधार पर एक पेंटर ने बनाई है।

आजाद भारत के सबसे बड़े सवाल का जवाब मिल गया है। अब यह बात लगभग साफ हो गई है कि फैजाबाद के गुमनामी बाबा उर्फ भगवानजी ही सुभाषचंद्र बोस थे। पिछले कुछ दिनों से फैजाबाद के ट्रेजरी में बंद गुमनामी बाबा के बक्सों को खोला जा रहा है। अब तक इनमें कई ऐसी चीजें मिल चुकी हैं जिससे ये इशारा मिलता है कि वो ही नेताजी थे। लेकिन 26 नंबर के बक्से को खोलने पर जो चीज मिली है, उसे देखकर हर किसी की आंखें फटी रह गईं। ये ऐसी चीज है जो सिर्फ और सिर्फ नेताजी के पास ही हो सकती थी किसी और के पास नहीं। उम्मीद की जा रही है कि सरकार बहुत जल्द औपचारिक तौर पर इस बात की पुष्टि कर सकती है कि गुमनामी बाबा ही नेताजी थे।

गुमनामी बाबा के 26वें बक्से में क्या मिला?

बक्से में एक ओरिजनल समन मिला है। ये समन 4 अगस्त 1972 को खोसला आयोग ने नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस को भेजा था। इसमें उनसे आयोग के आगे हाजिर होकर बयान दर्ज कराने को कहा गया था। सवाल ये है कि जो समन नेताजी के परिवार को भेजा गया था, वो गुमनामी बाबा के पास कैसे पहुंचा।

26वें बक्से में और क्या-क्या मिला?

  • दिल्ली में अमेरिकी दूतावास ने 10 जनवरी 1959 को गुमनामी बाबा के सीतापुर के पते पर एक चिट्ठी भेजी थी। वो चिट्ठी भी इसी बक्से में मिली।
  • इस बक्से में चार टूटे हुए दांत भी मिले हैं। अब इनका डीएनए टेस्ट कराया जाएगा कि क्या ये दांत नेताजी के ही हैं।
  • इसके अलावा कई चिट्ठियां भी मिली हैं। इनसे साफ होता है कि गुमनामी बाबा कुछ लोगों से पत्र व्यवहार के जरिए संपर्क में थे।
  • विदेशी कंपनी रोलेक्स और ओमेगा की घड़ियां मिली हैं। इनकी मरम्मत की रसीदें भी मिली हैं, जिनसे पता चलता है कि गुमनामी बाबा खराबी होने पर इन्हें विदेश भिजवाते थे।
  • एक फेमिली फोटो भी मिली है, जिसमें नेताजी के कई रिश्तेदार हैं। इनमें उनके पिता जानकीनाथ बोस और मां प्रभावती बोस भी हैं।
नेताजी के परिवार की ये वो तस्वीर है जो गुमनामी बाबा के बक्से से निकली है। इनमें उनके माता-पिता की भी फोटो है।

नेताजी के परिवार की ये वो तस्वीर है जो गुमनामी बाबा के बक्से से निकली है। इनमें उनके माता-पिता की भी फोटो है।

बाकी बक्सों में और क्या-क्या मिला है?

  • एक बक्से में 1967 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस पर जारी किए गए 2 डाक टिकट मिले।
  • कुछ बक्सों में आजाद हिंद फौज के खुफिया अधिकारी प्रतिभा मोहन रॉय की कई चिट्ठियां और टेलीग्राम मिले हैं। इन चिट्ठियों में लिखी बातों का अभी खुलासा नहीं हुआ है।
  • इनमें 31 मार्च 1985 को भेजा एक टेलीग्राम भी है, जिसमें लिखा है कि वसंती दुर्गा पूजा पर प्रणाम स्वीकार करें।
  • नेताजी के ड्राइवर रहे कर्नल निजामुद्दीन के बेटे अकरम ने उस दूरबीन की पहचान की है, जिसका इस्तेमाल आजाद हिंद के सदस्य करते थे। कर्नल निजामुद्दीन अभी जिंदा हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी बनारस यात्रा के दौरान उनसे मिले भी थे।
  • बक्सों में 13 मार्च 1978 को एक अखबार में छपे लेख की कटिंग भी मिली, जिसमें दावा किया गया है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस जिंदा हैं और अभी रूस में रह रहे हैं।
  • एक बक्से में  ‘हिमालयन ब्लंडर’ नाम की किताब मिली है, जिसमें कई जगहों पर अंडरलाइन किया गया है। इसमें लगभग हर दूसरे पेज पर नोट्स लिखे हुए हैं।
  • गुमनामी बाबा आरएसएस के नेताओं के संपर्क में थे। एक बक्से में 16 सितंबर 1972 को लिखा आरएसएस के उस वक्त के प्रमुख गुरु गोलवलकर की चिट्ठी मिली है। इसमें गोलवलकर ने उन्हें ‘पूज्यपद श्रीमान स्वामी विजयानंदजी महाराज’ नाम से संबोधित किया है।चिट्ठी में गोलवलकर ने लिखा है- मुझे 25 अगस्त से 2 सितंबर तक लिखे आपके पत्र 6 सितंबर 1972 को मिले। अगर आप पत्र में लिखी 3 जगहों में से एक जगह को नाम लेते हैं, तो मेरा काम आसान हो जाएगा। मैं 18 सितंबर से 12 अक्टूबर तक प्रवास पर रहूंगा। इस बीच में 3 दिन के लिए नागपुर में भी रहूंगा।
  • बक्से खोलने का काम पूरा हो गया है। 2 दिन बाद दिल्ली से एक टेक्निकल टीम फैजाबाद पहुंच रही है। ये टीम गुमनामी बाबा से जुड़ी चीजों को कब्जे में लेकर इन्हें वैज्ञानिक रूप से संरक्षित करने का काम करेगी।
फैजाबाद में आज भी सरयू नदी के किनारे गुमनामी बाबा की समाधि बनी हुई है। इस पर जन्म की तारीख वही है जो नेताजी बोस की है, लेकिन मृत्यु की तारीख की जगह खाली रखी गई है।

फैजाबाद में आज भी सरयू नदी के किनारे गुमनामी बाबा की समाधि बनी हुई है। इस पर जन्म की तारीख वही है जो नेताजी बोस की है, लेकिन मृत्यु की तारीख की जगह 3 सवालिया निशान बने हुए हैं।

कौन थे गुमनामी बाबा?

यूपी के फैजाबाद में सिविल लाइंस इलाके में रामभवन नाम के एक घर में करीब 3 साल तक गुमनामी बाबा रहे थे। वो कहां से आए थे ये बात कोई नहीं जानता था। यहीं पर 16 सितंबर 1985 को उनकी रहस्यमय हालात में मौत हो गई थी। उनके निधन के बाद जब कमरा खोला गया तो वहां ऐसी-ऐसी चीजें मिलीं जिनका ताल्लुक सुभाषचंद्र बोस से था। उनके कमरे से आजाद हिंद फौज की एक वर्दी भी मिली थी। गुमनामी बाबा को देख चुके लोगों के मुताबिक वो करीब छह फुट के लंबे-चौड़े शख्स थे। जर्मन, संस्कृत, बंगाली और हिंदी भाषा धाराप्रवाह बोलते थे। उनके साथ रहने वाले कुछ लोगों ने यह तक बताया है कि गुमनामी बाबा से जब भी उनके पिछले जीवन के बारे में पूछा गया तो वो कहते थे कि मेरा नाम तो भारत के रजिस्टर से ही काट दिया गया है। आजाद हिंद फौज से जुड़ी रहीं लीला रॉय नेताजी की तलाश में फैजाबाद गई थीं और उनसे मुलाकात की थी, जिसके बाद उन्होंने कहा था कि मुझे यकीन है कि वो नेताजी ही हैं। आजाद हिंद फौज के सदस्य रहे कई लोग पूरे दावे के साथ यही बात कहते रहे हैं।

गुमनामी बाबा के निधन के बाद फैजाबाद के लोकल अखबारों ने उन्हें पूरे दावे के साथ नेताजी ही माना था। ये वहां के ही एक अखबार का पहला पन्ना है।

गुमनामी बाबा के निधन के बाद फैजाबाद के लोकल अखबारों ने उन्हें पूरे दावे के साथ नेताजी ही माना था। ये वहां के ही एक अखबार का पहला पन्ना है।

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