मज़ाक नहीं, ये पोशाक भारतीय कारीगरों की देन हैं!

आसियान देशों की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हरे रंग की पोशाक वाली तस्वीरों पर सोशल मीडिया में जमकर मज़ाक उड़ाया जा रहा है। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं। लेकिन कम लोगों को पता होगा कि मलेशिया और इंडोनेशिया में इस पारंपरिक पोशाक को पहनना सम्मान की बात माना जाता है। ये पोशाकें बाटिक कला का बेहतरीन नमूना मानी जाती हैं। बाटिक कला सदियों पहले गुजरात और राजस्थान के कारीगरों के जरिए मलेशिया और इंडोनेशिया तक पहुंची थी।

2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आसियान बैठक के दौरान की तस्वीर।

2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की आसियान बैठक के दौरान की तस्वीर।

आसियान की बैठक में आम है यह पोशाक

आसियान देशों की बैठक में आने वाले राष्ट्राध्यक्षों के सम्मान के तौर पर उन्हें यह पोशाक पहनने को दी जाती है। नरेंद्र मोदी से पहले मनमोहन सिंह ने भी यह ड्रेस पहनी थी। लेकिन तब किसी का ध्यान उनकी तस्वीरों पर नहीं गया था। भारत ही नहीं, अमेरिका, जापान और दुनिया के तमाम देशों के नेता इंडोनेशिया और मलेशिया दौरों में यह ड्रेस पहनते हैं।

ओबामा ने भी पहनी यह खास पारंपरिक पोशाक, लेकिन उनके देश में उनका मज़ाक नहीं उड़ाया गया।

ओबामा ने भी पहनी यह खास पारंपरिक पोशाक, लेकिन उनके देश में उनका मज़ाक नहीं उड़ाया गया।

भारतीय कारीगरों की देन है बाटिक कला

इंडोनेशियाई भाषा में बाटिक का मतलब है मोम से लिखना या चित्र बनाना। जैसा कि नाम है कपड़े में ये पेंटिंग बनाने के लिए मोम का इस्तेमाल किया जाता है। यह कला गुजरात, राजस्थान, पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों में अलग-अलग नामों से चलन में रही है। आदिवासी परंपराओं में यह कला सदियों से चलती आई, लेकिन अंग्रेजी शासन के दौरान अनदेखी की वजह से कारीगरों को रोजी-रोटी के लिए दूसरे देशों में जाना पड़ा। इन कारीगरों को इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देशों में अनुकूल परिस्थितियां मिलीं और वहां पर एक नए रूप रंग में यह कला फलने-फूलने लगी। इन पोशाकों को आज वहां पर सम्मान की नज़र से देखा जाता है और इन्हें पहनने वाला विशिष्ट माना जाता है। यह अलग बात कि हम खुद ही अपनी परंपरा को भुला चुके हैं और दूसरे देश में अपने प्रधानमंत्री के यह पोशाक पहनने में मज़ाक उड़ाने लगते हैं।

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